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Essay on Dowry System in Hindi | दहेज़ प्रथा पर निबंध

Essay on Dowry System in Hindi | दहेज़ प्रथा पर निबंध – हमारे समाज में किसी लड़की की शादी के समय लड़की के परिवार वालों के द्वारा लड़के या उसके परिवार वालों को नगद या किसी भी प्रकार की किमती चीज़ बिना मूल्य में देने को दहेज़ कहा जाता है।

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Essay on Dowry System in Hindi | दहेज़ प्रथा पर निबंध

दहेज प्रथा एक सामाजिक समस्या है। दहेज प्रथा गैर कानूनी होने के बावजूद भी ये हमारे समाज में खुली तौर पर राज़ करती है। महात्मा गाँधी जी ने दहेज प्रथा के बारे में कहा था कि –

“जो भी व्यक्ति दहेज को शादी की जरुरी शर्त बना देता है , वह अपने शिक्षा और अपने देश को बदनाम करता है, और साथ ही पूरी महिला जात का भी अपमान करता है।”

ये बात महात्मा गाँधी जी ने देश की आजादी से पहले कही थी। लेकिन आजादी के इतने साल बाद भी दहेज प्रथा को निभाया जाता है। हमारे सभ्य समाज के गाल पर इससे बड़ा तमाचा और क्या हो सकता है?

दहेज अब एक लिप्सा हो गई है, जो कभी शान्त नहीं होती। वर के लोभी माता-पिता यह चाह करते हैं कि लड़की अपने मायके वालों से सदा कुछ-न-कुछ लाती ही रहे और उनका घर भरती रहे। वे अपने लड़के को पैसा पैदा करने की मशीन समझते हैं और बेचारी बहू को मुरगी, जो रोज उन्हें सोने का अडा देती रहे। माता- पिता अपनी बेटी की मांग कब तक पूरी कर सकते हैं। फिर वे भी यह जानते हैं कि बेटी जो कुछ कर रही है, वह उनकी बेटी नहीं वरन् ससुराल वालों के दबाव के कारण कह रही है।

क्या कदम उठाने होंगे

यदि फरमाइश पूरी न की गई तो हो सकता है कि उनकी लाड़ली बिटिया प्रताड़ित की जाए, उसे यातनाएं दी जाएं और यह भी असंभव नहीं है कि उसे मार दिया जाए। ऐसी न जाने कितनी तरुणियों को जला देने, मार डालने की खबरें अखबारों में छपती रहती हैं ।

दहेज-दानव को रोकने के लिए सरकार द्वारा सख्त कानून बनाया गया है। इस कानून के अनुसार दहेज लेना और दहेज देना दोनों अपराध माने गए हैं। अपराध प्रमाणित होने पर सजा और जुर्माना दोनों भरना पड़ता है। यह कानून कालान्तर में संशोधित करके अधिक कठोर बना दिया गया है।

किन्तु ऐसा लगता है कि कहीं-न-कहीं कोई कमी इसमें अवश्य रह गई है, क्योंकि न तो दहेज लेने में कोई अंतर आया है और न नवयुवतियों द्वारा की जाने वाली आत्महत्याओं अथवा उनकी हत्याओं में ही कोई कमी आई है। दहेज संबंधी कानून से बचने के लिए दहेज लेने और दहेज देने के तरीके बदल गए हैं।

दहेज के कलंक और दहेज रूपी सामाजिक बुराई को केवल कानून के भरोसे नहीं रोका जा सकता। इसके रोकने के लिए लोगों की मानसिकता में बदलाव लाया जाना चाहिए। विवाह अपनी-अपनी जाति में करने की जो परम्परा है उसे तोड़ना होगा तथा अन्तर्राज्यीय विवाहों को प्रोत्साहन देना होगा, तभी दहेज लेने के मौके घटेंगे और विवाह का क्षेत्र व्यापक बनेगा।

दहेज प्रथा के कारण ही नारी जाती को कई प्रकार के अत्याचार को सहना पड़ा है। आज हमें हर घर तक इस संदेश को पहुंचाना ही होगा कि दहेज लेना पाप है और देना सही नहीं है। आज हमें मिलजुल कर कसम खाना होगा की हम दहेज प्रथा को उखाड़ फेकेंगे और भारत की हर बेटी का जीवन शांतिपूर्ण बनाएंगे।


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